लोगों के कल्याण के लिए देवी दुर्गा ने लिया मां शाकंभरी रूप

 गुरुवार यानी आज पौष महीने की पूर्णिमा है। मार्कंडेय पुराण के मुताबिक, इस दिन माता शाकंभरी का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। इन देवी को मां दुर्गा का ही रूप माना जाता है। धर्म ग्रंथों के जानकारों का कहना है कि पौष महीने की पूर्णिमा तिथि पर देवी दुर्गा ने इंसानों के कल्याण के लिए शाकंभरी रूप लिया था। इस दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न दान किया जाता है। साथ ही शाक यानी कच्ची सब्जियां, फल और जल का भी दान करने की परंपरा है। माना जाता है कि ऐसा करने से हर तरह की शारीरिक परेशानियां दूर होती हैं और कई गुना पुण्य मिलता है। साथ ही देवी दुर्गा भी प्रसन्न होती हैं। इस दिन किए गए दान से उम्र भी बढ़ती है।

इसलिए देवी दुर्गा ने लिया शाकंभरी अवतार

दानवों के उत्पात से पीडि़त भक्त कई सालों तक सूखा और अकाल से परेशान रहे। इसके बाद उन्होंने देवी दुर्गा से प्रार्थना की। तब देवी इस अवतार में प्रकट हुईं, उनकी हजारों आखें थीं। - अपने भक्तों को इस हाल में देखकर देवी की इन हजारों आंखों से नौ दिनों तक लगातार आंसुओं की बारिश हुई, जिससे पूरी पृथ्वी पर हरियाली छा गई। - यही देवी शताक्षी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई एवं इन्ही देवी ने कृपा करके अपने अंगों से कई प्रकार की शाक, फल एवं वनस्पतियों को प्रकट किया। इसलिए उनका नाम शाकंभरी प्रसिद्ध हुआ। - पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शाकंभरी नवरात्र का आरंभ होता है, जो पौष पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इस दिन शाकंभरी जयंती का पर्व मनाया जाता है। माता शाकंभरी का स्वरूप मार्कंडेय पुराण के मुताबिक देवी शाकंभरी आदिशक्ति दुर्गा के अवतारों में एक हैं। दुर्गा के सभी अवतारों में से रक्ततिका, भीमा, भ्रामरी, शाकंभरी प्रसिद्ध हैं। दुर्गा ससशती के मूर्ति रहस्य में देवी शाकंभरी के रूप का जिक्र इस प्रकार है

मंत्र शाकंभरी नीलवर्णानीलोत्पलक्लिोचना। 
मुष्टिशिलीमुखापूर्णकमलंकमलालया।।

अर्थ - देवी शाकंभरी का वर्ण नीला है, नील कमल के सदृश ही इनके नेत्र हैं। ये पद्मासना हैं अर्थात कमल पुष्प पर ही विराजती हैं। इनकी एक मुट्ठी में कमल का फूल रहता है और दूसरी मुट्ठी बाणों से भरी रहती है।