कांग्रेस के सारे सूत्र पड़े खामोश, चारों ओर सन्नाटा

नई दिल्ली. कांग्रेस के तमाम सूत्र ख़ामोश हैं। कोई कुछ नहीं बोल रहा। कई वरिष्ठ नेता ऑन रिकार्ड तो दूर, ऑफ रिकार्ड बात करने से भी परहेज़ कर रहे हैं। आखरि ऐसा क्यों है कि सूत्रधारों से भरी पार्टी के तमाम सूत्रों ने फ़िलहाल खामोशी अख्तियार कर ली है? 

    सोमवार को राहुल गांधी ने असम और तमिलनाडु के पार्टी नेताओं के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग की। हालांकि ये किसी चुनाव से पहले संगठन की आम आंतरिक बैठक थी। पर अमूमन ऐसी आंतरिक बैठकों में क्या कुछ हुआ, किसने किसको क्या बोला, किसका रुख कैसा रहा, किसने किसको टोका, किसने किसे क्या समझाने की कोशिश की, कौन किसके साथ खड़ा नजर आया, किसने किसको चुप रहने का इशारा किया, किसने किसकी बात बीच में काट दी, किसने किसका बचाव किया, किसने किसको निशाने पर लिया... ऐसी कई बातें सूत्रों के हवाले से छनकर आने की कांग्रेस की परंपरा रही है। कई का खंडन आता था, कई का नहीं और कई को खंडन के लायक भी नहीं माना जाता था। तो क्या ये परंपरा अब खत्म होने जा रही है? या इस पर तात्कालिक विराम भर लगा है? जो भी है, पार्टी के एक नेता आपसी बातचीत में इस बात की तस्दीक करते हैं कि बदली हुई परिस्थिति में सभी एक-दूसरे का नए सिरे से आंकने की कोशिश में हैं।

    दरअसल अहमद पटेल की कोरोना वायरस की चपेट में आकर हुई असामयिक मृत्यु ने पार्टी नेताओं को कई स्तर पर झकझोर दिया है। भावनात्मक स्तर पर भी और राजनीतिक स्तर पर भी। पटेल के जाने के बाद पार्टी में एक शून्य पैदा हआ है। यही शून्य पार्टी के भीतर एक तूफान ला सकता है। खामोशी उसकी पूर्व पीठिका हो सकती है। अहमद पटेल की दुखद मौत के बाद पार्टी फिलहाल मातम में है। इस बीच ऐसी कोई बड़ी राजनीतिक बयानबाजी नहीं हुई है, जिससे पार्टी के भीतर की धार का पता चले। वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा का एक ट्वीट जरूर आया, जिसमें वे प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते नज़र आए। इससे ये कयास लगाया जाने लगा कि वे बीजेपी की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं। लेकिन फिर आनन्द शर्मा ने स्वयं उस ट्वीट को डिलीट कर दूसरा ट्वीट किया। लिखा कि पहले ट्वीट में वाक्य विन्यास संबंधी कुछ गलती हो गई थी सो अर्थ का अनर्थ हो गया। आनन्द शर्मा, गुलाब नबी आज़ाद के साथ उन 23 चर्चित नामों में एक हैं जिन्होंने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी। पार्टी नेतृत्व को लेकर कुछ सवाल पूछे थे, सलाह दी थी और आगे की राह जाननी चाही थी। उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उन नेताओं को कुछ जवाब भी मिला था। अहमद पटेल ने भी अपने शब्दों में समझाया था। वे न सिर्फ गांधी परिवार और उसके नेतृत्व की लाल बनकर सामने आए बल्कि अंदरूनी असंतोष पर मिट्टी डालकर आगे की राह भी दिखाने की कोशिश की थी। अब अहमद पटेल नहीं हैं। वे सोनिया गांधी के ऐसे सिपहसालार थे जो पार्टी के असंतुष्टों की सनते भी थे, उनकी बात आलाकमान के सामने रखते भी थे और दोनो पक्षों को समझाते भी थे। अब वो संबल खत्म हो गया है। तो अब क्या? इस सवाल पर भी तमाम सूत्र खामोश हैं। दरअसल, अहमद पटेल की असामयिक मृत्यु ने पार्टी के सामने दो स्थितियां पैदा की हैं। या तो तमाम असंतुष्ट अब गांधी परिवार की सर्वसत्ता को स्वीकार लें या फिर अपनी अपनी राह लें। क्योंकि सबों को एक सूत्र में पिरोने वाले शख्स का साया उठ गया है। अगर किसी को राहुल गांधी के नेतृत्व से शिकायत है तो क्या अब वे सीधे सोनिया गांधी के पास जाएंगे? निश्चित रूप से नहीं। तो समय की जरूरत है खामोशी। असंतोष के पुराने रुखों और बयानों को नई धार देना अभी मुनासिब नहीं। जिन बातों को पार्टी नेतृत्व द्वारा पहले 'दिल पर नहीं लिया गया था, वह ज़ख्म कुरद सकता है। उस ज़ख्म को जड़ से मिटाने का फैसला लिया जा सकता है। इसलिए पहले से चढ़ाकर रखी गई प्रत्यंचा को अभी ढीला छोड़ना ही बुद्धिमानी है। कुल मिलाकर ये कि अब असंतुष्ट कांग्रेसजन अलग राग अलापना बंद कर दें। 

    अब जो फैसला लेना है वह राहुल गांधी को ही लेना है। पहले कई सूत्र दावा करते रहे हैं कि तमाम फैसले वही लेते हैं। सोनिया गांधी की अंतरिम अध्यक्षता तो एक बाल मात्र रहा है। अब सोनिया गांधी से सबसे विश्वस्त सिपहसालार और राजनीतिक सलाहकार के न होने से कई फैसलों में उनकी सलाह की कमी नजर आ सकती है। जिन्होंने राहल गांधी को साधने की कोशिश की थी, वे खुद सथ सकते हैं। इसलिए अब उनके सामने की राह यही है कि वे किसी भी तरह के बगावती तेवर को छोड़ें और गांधी परिवार की छत्रछाया में एकजुटता का भरोसा दिलाने की कोशिश में जुट जाएं। हां, जिन असंतुष्टों के पास अपना जनाधार है वह तब भी अलग राह लेने की सोच सकते हैं। मतलब जिन नेताओं ने पहले कभी बड़ी चुनावी कामयाबी हासिल की हो और जिन नेताओं ने किसी राज्य में सत्ता चलायी हो. उनके तेवर अलग हो सकते हैं। वे गांधी परिवार की छत्रछाया से निकलकर अलग मोर्चा बनाने की सोच सकते हैं। लेकिन जो पूरी तरह से राज्यसभा धारी हैं उनके लिए फैसला मुश्किल होगा। खासतौर पर तब, जब राज्यसभा जाने का कोई वैकल्पिक दरवाजा खला न हो। किसी दूसरी पार्टी के लिए उनकी उपयोगिता न हो और अपनी पार्टी में एकजुट दबाव समूह बनाए रखने के लिए कोई नेतृत्व न हो। ऐसे में मन मसोसकर रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं 49 साल कांग्रेस को देने वाले जनार्दन द्विवेदी, अहमद पटेल के चले जाने पर कहते हैं कि यह अत्यंत दुखद और असामयिक है।