कौन है आदिवासियों और दलितों का सच्चा हितैषी?*
 

'डॉ अर्पण जैन 'अविचल''

 

मध्यप्रदेश की राजनीति में वैसे ही घमासान की स्थिति बनी हुई है, कभी बची,कभी उखड़ी जैसी उहापोह से रोज़ कांग्रेस की राज्य सरकार को दो चार होना पड़ता है। इसी दौरान राज्यसभा के चुनाव भी आ गए, जब दोनों ही मुख्य राजनैतिक दलों के उम्मीदवारों की ओर नज़र डालो तो समझ आता है कि किसे आदिवासियों और दलितों की असल चिंता हैं?


 

कांग्रेस ने ग्वालियर से आने वाले कांग्रेस नेता फूल सिंह बरैया को पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ राज्यसभा का प्रत्याशी घोषित किया है। बरैया लोकसभा चुनाव के पहले मार्च 2019 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। फूल सिंह बरैया कांग्रेस में शामिल होने से पहले बहुजन संघर्ष दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। वह लोकसभा चुनावों के पहले कमलनाथ की मौजूदगी में अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए थे। बरैया किसी ज़माने में बहुजन समाज पार्टी के साथ भी रहे हैं। 

वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने आदिवासियों पर प्रभाव डालने के लिए आदिवासी संगठनों का विरोध करने वाले, यानी आदिवासी आरक्षण के घोर विरोधी को ही आदिवासियों का प्रतिनिधि नेता बनाने की कोशिश में डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी को राज्यसभा प्रत्याशी बना लिया।

डॉ सुमेर सिंह सोलंकी ने तो आदिवासी संगठनों को नकारात्मक व अराष्ट्रवादी बताया है। इसी सोच को तवज्जों देने के कारण भाजपा की सोच भी सामने आ ही गई।

विधानसभा में भी भारतीय जनता पार्टी इसी सोच के चलते आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों से बड़ा नुकसान उठा चुकी है, फिर भी अपनी आदिवासी-दलित विरोधी सोच के चलते भाजपा ने अभी भी डॉ सुमेरसिंह को उम्मीदवार बना कर यह दूसरी बार सिद्ध किया है कि उन्हें आदिवासी हितों की न पहले परवाह रही न ही अब।

आदिवासियों और दलितों को महज वोटबैंक मान कर इस्तेमाल करने में दक्ष भाजपा इस बार राज्यसभा में भी आदिवासी हितों पर हमला करने वाले सुमेर सिंह को उम्मीदवार बना कर यही दर्शाना चाहती है।

वैसे तो डॉ. सुमेर सिंह का विरोध बहुत हो रहा है किंतु भाजपा उस विरोध को भी नकारकर आदिवासियों के साथ अन्याय करने में अव्वल आ रही हैं।

अब देखना यह भी है कि आखिर कब तक आदिवासी भाजपा को ऐसी स्थिति में भी समर्थन देते रहेंगे। परिणाम तो भविष्य में आएँगे परबिस निर्णय के कारण भाजपा का आदिवासी विरोधी चेहरा तो सामने आ ही गया।